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उन सर्द पतझड़ कि लाल नारंगी सी शामों को ,
जब दिन भर के शतरंज के बाद
पहेलियाँ फ़िर फुसफुसाती हैं कुछ मेरे कानों में
और निकल पड़ता हूँ , मैं खुद को थोडा रोक थोडा छोड़
ढूंढ़ने वापस वो गुमसुम सा सुकून
वही सुकून जो कई पतझड़ पहले मेरे संग रहता था
और अब बाकी पहरों में दिखता नहीं है
और जाने कैसे वापस, पल भर में ही
-सुकून कि वो जानी पहचानी सी उंगलीयाँ
मेरे बालों में गुथि हुई सालों कि इन पहेलियों को
सुलझाती हुई सी महसूस होती हैं
-और कभी कभी उन्ही पहेलियों को नरम झोंकों से
उड़ा ले जाती हुई
कोई कानाफ़ूसी भी सुनायी देती है
-कभी बादल से छाके निकल जाते हैं, आँखों पर से मेरी
-और यहाँ नींद भी बड़ी आराम से लग जाती है
क्या तुम सचमुच आते हो , मेरे बाल सहलाने
क्या तुम्हे भी पतझड़ कि उन लाल नारंगी सर्द शामों को ऐसा ही महसूस होता है
कभी सोचता हूँ कि शायद होता ही होगा
की मैं भी तो उन्ही लम्हों में जीता हूँ
जहाँ तुम्हारे मन कि उलझनों को
अपने सीने से लगा के , उसी में खींच लेता हूँ
या कभी उन्ही को
ख़ुशी के इक नटखट झोंखे के ज़रिये तुम्हारी नादानगी से चुरा लेता हूँ
उन सर्द पतझड़ की लाल नारंगी सी शामों को ,
जब उन शतरंज के बंधनों का, इन पहेलियों से हो रहा होता होगा सामना
तो शायद सचमुच ही तुम आती होंगी