Wednesday, April 30, 2014

Vidambanaayein

(विडम्बनायें )


रोज़ मेरा  दिल रोता है 
रोज़ मैं  इसको सहला लिया करता हूँ। 
रोज़ उपद्रवी ख्याल आते हैं
उनको भी दबा  लिया करता  हूँ।।

मेरे सच को झूठ कह कुचल देते हो 
स्वयं झूठ बोल , मुंह छुपा के चल देते हो 

कल मुझे समझा के अहिंसा का अह्म 
तुम आज मुझी निहत्थे को धूल कर देते हो 

गलती से इतना डरते हो 
की उन्हें अनदेखा ही  कर देते हो 
और तो और , मुझे भी कुछ सही नहीं करने देते हो 

जो कर चुके हो , जो सुनते आये हो 
उसपे इतनाा  गुरूर करते हो,
की वह कहीं रद्द ना हो जाये 
हर नयी सोच को ही  खल्लास कर देते हो 

झााँक  नहीं पाते हो 
अपनी ही बिल्डिंग की परछाई में 
गरीब के वो अनपढ़ भूखे बच्चे 
जो थे  रहे रो 
और दूरदर्शिता की बातें  करते हो 

हर मौका भलाई का , जीने का 
आँखों के सामने से बस गुज़रते हुये हुये ही देखते हो 
और चन्द  प्रमोशन पाकर 
ओप्पोर्चुनिस्ट  खुद को कहते हो 

लड़ते खूब हो 
की मोदी हो य आप हो 
लेकिन वोट डालने नहीं जाते हो 

अंत नहीं हैं इन वाक्यों का… सो मैं ही रुक जाता हूँ 

रोज़ मेरा दिल रोता है, बहुत रोता है 
रोज़ मैं  इसको सहला लिया करता हूँ

कोई तो खामी ज़रूर है 
जो फ़िर भी मेरा ही दिल रोता है , तुम्हारा नहीं