Tuesday, January 6, 2015

On recent Vedic text revival controversies



गुनगुनाये भजन सुरीले  मेरे पूर्वजों ने नेति नेति के । 

आज हम या तो कुछ भी मन चाहा  गुनगुना  रहे हैं
या हर परायी चीज़ पे नेति नेति की नीति आज़मा रहे हैं।।

सब भूल गए परन्तु , कि भजन केवल पूजा के समय गाये जाते थे ।।

I want to focus this piece on the lost context with which some of our politicians are trying to revive Vedic texts (which could be the most positive motive; I am not denying the ulterior motives they might have) , and how in that resulting frenzy some of the country men, media and friends actually take pride in discrediting the true achievements of their/Indian ancient society.


कर्तव्य और ज्ञान बचपन में खूब लड़ा करते थे।  उनकी माँ को उस लड़ाई के पीछे एक अद्भुत से  वात्सल्य की नर्मता ज्ञात होती थी।  आखिर लड़कर दोनों उसी के पास आते थे, और फ़िर उसके ममता के प्यार में खो जाते थे  - घुला देते थे अपने ससारे बनावटी मतभेद उस ममता के प्यार में। उनका काम था लड़ना और माँ का काम उन्हें वापस मिला देना।

इक दिन अचानक उनकी माँ की मृत्यु हो गयी।  दोनों बहुत रोये।  दोनों ने ठान लिया कि खूब मेहनत करेंगे और माँ का नाम रोशन करेंगे। समय के साथ साथ दोनों बड़े होते गए , और अपने द्वारा चुने हुए साँचों में ढलते गए। इस दरमियाँ , दोनों के बीच फ़ासले भी बढ़ते गए - कोई मन मुटाव नहीं था परन्तु कुछ common भी नहीं था उनके रास्तों और रुचियों में।  मानलो की जैसे उनको बाँध के रखने वाली डोर - उनकी माँ - अब टूट चुकी थी।
कर्तव्य, इक और, कर्म करने में लगा था, बेसुधगी के साथ।  उसने गाँव वालों के लिए कई कुएं खोदे, कई सड़कें बनायी, प्याऊ लगाए और बहुत कुच।  उधर दूसरी तरफ , ज्ञान ने शिक्षा देने का दामोदार एवं इकॉनमी और पॉलिटिक्स की बातें शुरू कर दी
कर्तव्य - practical, objective, right vs wrong, strong sense of ethics,

TO BE CONTINUED