एक धुंध सी में झाँक रहा हूँ
थोड़ा अँधेरा है, और थोड़ा ठण्ड का एहसास
थोड़ी सी नमी है , थोड़ी सी खराश
थोड़ा कम दिख रहा है, पर गौर कर पा रहा हूँ
कुछ पास वाले मकानों की धुंधली सी रूपदेखा दिख रही है
रूपरेखा जो कुछ ही दिन पहले किसी ने रची होगी, किसी ने तराशी होगी, और किसी ने सराही होगी
ढाल दिया होगे कल्पना को शख्सियत की साँसों में
कुछ दूर वाले मकान जो अभी दिख भी नहीं रहे हैं, वह होंगे तो ज़रूर
उन्ही की बुनियाद पे कल्पना रची, तराशी और सराही गयी होगी - इन पास वाले दृश्य मकानों की
जब अंदर झांकता हूँ, तब भी ऐसा ही एहसास होता है

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