शायद थोड़ा कुछ छू गया होगा
एक रात थोड़ी Insomnia की हुई
करवटों के पन्ने से पलटते रहे
उनमें भीनी मीठी सी खुशबू वाले, कुछ हाल ही के बीते लम्हे
बुदबुदा रहे थे - थोड़े नमकीन खुशबू के भी थे ।।
खुशबुओं में चहचहाहट थी, एक निर्मल सा comfort भी, और भरके शोखियाँ
बड़ी हलकी सी आंच, चिंगारी पनपने से पहले वाली
और थोड़ी हिचकिचाहट, हया और लक्ष्मन रेखा छुपी हुई थी उन आज़ादियों के पीछे
सब खुशबुओं में था, उन करवटों के पन्नों की
सवेरे किसी ने पूछ लिया की जल्दी कैसे उठ गए, तो -
तो लगा शायद थोड़ा कुछ छू गया होगा
पर अभी तो छूआ भी नहीं
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