क्या मैं इन्साफ कर पा रहा हूँ
तुम्हारी इबादत से ?
जो मैं सुःख तुम्हे दे सकता था
वो मैं शायद सुखा के बैठ गया हूँ ज़हन में
जैसे, पानी में चीनी नीचे बैठ गयी हो
भोली हो , इमोशंस की रंगोली हो ,
अच्छी लगती हो।
मेरा आइना हो, खुशियों की खोली हो
जब रूठी हो , दुल्हन की डोली हो
आँख मिचोली हो
कभी दरिया हो, कभी झोंका , कभी खुसभी की पूड़ी हो
बस जाओ मेरे सीने में आके
अब तुम ही मेरे जीवन की डोरी हो।
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