Wednesday, September 25, 2019

Khazane ko tatolte tatolte

वो रात कुछ जवान थी
ऐसे आज भी याद है जो

छुआ तो था कुछ मुझे
कुछ हुआ तो ज़रूर था

बारिशों का आगाज़ था
कानों में तुम्हारा साज़ था
आँखों के सामने आँखों का  सबसे गहरा राज़ था
जो चाहा था कब से पल, वो आज था
क्या दमदार एहसान था

सीधे, ख़ज़ानों के बक्सों में लॉक कर दिया था मैंने।

बाकी ख़ज़ाने को टटोलते टटोलते कभी तुम पर भी नज़र पड़ जाती है

ज़िन्दगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात,
एक अनजान हसीना से मुलाकात की रात 

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तस्वीर ही तुम्हारी बनाके
उन लकीरों पे आँखें दौड़ाके
तुम्हे छू लिया करता हूँ

खुशबू भी आ जाती है तुम्हारी ,
ज़ुल्फ़ों की शाम भी।

कभी कभी तो लगता है की कहीं तुम मेरी कल्पना ही तो नहीं थीं 

1 comment:

logicallywhimsical said...
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